🌿 अकेला चल पड़ा
— एक कविता उन राहों की, जो अकेले तय की गईं
कभी ज़िंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है जहाँ कोई साथ नहीं होता—न कोई साया, न कोई सहारा। पर वही मोड़ हमें अपने भीतर की रोशनी से मिलवाते हैं। यह कविता उसी सफर की कहानी है...
अकेला चल पड़ा
अकेला चल पड़ा था राहों में, न कोई साथ था, न साया,
हर मोड़ पर बिछे थे काँटे, हर पल था दुख का साया।
मन का दीपक बुझने को था, साँसों में बोझ भरा था,
हर मुस्कान के पीछे छिपा, एक दर्द पुराना तिरा था।
पर ठानी थी दिल ने फिर भी, हार माननी नहीं,
अंधेरे से लड़कर जीना है, ये राह आसान नहीं।
चलते-चलते रात बीती, थक कर भी रुका नहीं,
तभी उग आई पूरब से, सूरज की किरण कहीं।
नर्म सुनहरी रौशनी में, नयी किरण ने बात कही —
“हर दर्द के बाद सवेरा है, हर आँसू की भी कीमत सही।”
अब काँटों से डरता नहीं मैं, वो भी सबक सिखा गए,
जो साथ न चल सके राहों में, वो रास्ते दिखा गए।
उम्मीद फिर से जागी है अब, दिल में नयी रौशनी है,
अकेला नहीं, अपने संग अब, चल रही खुद ज़िंदगी है।
✨ कुछ शब्द पाठकों के लिए...
अगर आप भी किसी ऐसी राह से गुज़रे हैं जहाँ आपको खुद से ही बात करनी पड़ी, तो शायद ये कविता आपके दिल से बात कर सके।
कभी-कभी अकेले चलना ही हमें खुद से मिलवाता है। और जब हम खुद के साथ चलने लगते हैं, तो दुनिया पीछे नहीं रह जाती।
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Very nice 💯
ReplyDeleteBitter truth of life
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